दूबड़ी सप्तमी- दूबड़ी साते

कब: भाद्रपद/भादो मास- अगस्त/ सितम्बर

दूबड़ी साते की पूजा भादव मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को की जाती है। यह अनहोनी पर विजय पाने के लिए की जाती है। इस दिन स्त्रियाँ ठण्डा भोजन करती हैं।

क्या: पूजा की सामग्री

पाटा, बेर की झाड़ी का कोमल काँटा, मिट्टी, जल, रोली, चावल, फूल, दूध, दक्षिणा, मोई, रुपया बाजरे के आटे में घी, चीनी मिलाकर पानी से कड़ा गूंथ कर मोई बनाते हैं 
बायने के लिए कटोरी में भिगाया हुआ मोठ एवं बाजरा, रूरया पहली रात भिगा हुआ मोठ व बाजरा, ठण्डा भोजन 
यदि विवाहित बहन या बेटी उसी शहर में रहती है तो पहले दिन उसके घर बायना भेजा जाता है

कैसे: पूजा की विधि

एक पाटे पर मिट्टी से दूबड़ी साते की आकृति माण्डते हैं। आजकल लोग चित्र की भी पूजा कर लेते हैं। कई लोग जो पाटा बछबारस के दिन पूजते हैं वही पाटा रख लेते हैं और दूबड़ी साते के दिन उसको पूज लेते हैं। जल, दूध, मोई, मोठ, बाजरा, फूल, रोली, चावल चढ़ाकर पूजा करते हैं।

अपने टीका लगाते हैं। इस दिन थोड़ी-सी मोई के अन्दर एक बेर की झाड़ी का कांटा डालकर दो गोली बनाकर एक गोली व्रत करने वाली स्त्री निगल लेती है। एक गोली चढ़ा देते हैं।

बायना निकालना- भिगाए हुए मोठ एवं बाजरे को कटोरी में रखकर ऊपर रुपये रख दें। दोनों हाथ जोड़कर हाथ को पल्ले से ढककर चार बार कटोरी के ऊपर हाथ फेर लें। फिर अपने टीका निकाल लें। यह बायना सासूजी का आशीर्वाद लेने के लिए पाँव लगकर दे दें। यह बायना जिठानी या ननद को भी दिया जा सकता है। सुविधा अनुसार बायने को किसी ब्राह्मणी को या ब्राह्मण या मंदिर में पुजारी को भी भेज सकते हैं।

उजमन

लड़के के विवाह के पहले साल में दुबड़ी साते का उजमन किया जाता है। एक थाली में तेरह जगह भीगे हुए मोठ, बाजरे की कुड्डी बनाकर, उसके ऊपर एक साड़ी, ब्लाउज पीस व रुपये रखकर, हाथ फेरकर, सासूजी को पाँव लगकर देते है। दुबड़ी साते की कहानी हाथ में थोड़ा बाज़रा, मोठ लेकर सुनते/ पढ़ते हैं। कथा की समाप्ति पर हाथ का मोठ, बाजरा पाटे में ही छोड़ देते हैं। इसके बाद बिन्दायकजी की कहानी सुनते हैं।

 

दूबड़ी साते की कथा

एक साहूकार था। उसके साते बेटे थे। विवाह होते ही बेटों की मृत्यु हो जाती थी। छह बेटे तो इसी प्रकार मर गए। साहूकार ने डरते-डरते सातवें बेटे की शादी की तैयारियाँ शुरू कीं। बहन-बेटियों को शादी में आमंत्रित किया, लड़के की बुआ जब शादी के उत्सव में भाग लेने के लिए घर से निकली तो उसे रास्ते में एक कुम्हार मिला। बातचीत में बुआजी को मालूम चला कि साहूकार का बेटा विवाह के बाद भी जीवित रह सकता है, यदि दुबड़ी साते की पूजा करें, ठंडी रोटी खाएँ और शादी में सारे नेगचार उल्टे कर दें।

शादी में बुआजी ने ऐसा ही किया। वो गाली देते हुए ही घर में घुसीं। उन्होंने सारे नेगचार उल्टे करने शुरू किए। बारात निकलने को हुई तो बुआजी ने पिछले दरवाजे से बारात निकाली, तभी सामने का दरवाज़ा गिर पड़ा। सबके मना करने पर भी स्वयं ज़िद करके दूल्हे के साथ बारात में गईं। रास्ते में बाराती जब एक बड़ वृक्ष के नीचे आराम करने लगे तो बुआजी ने जानबूझकर सबको धूप में ही बैठने के लिए विवश किया तभी वह वृक्ष टूटकर गिर पड़ा। सभी ने बुआजी की सूझबूझ की बड़ी तारीफ की।

बारात पहुँचने पर जब सब दुकाव के लिए चले, तो बुआजी ने ज़िद करके पिछले दरवाज़े से दुकाव ले जाने के लिए कहा, तभी सामने का दरवाजा गिर पड़ा। फेरे के समय बुआजी कुम्हार के कहे अनुसार एक मिट्टी के बर्तन में दूध और एक तांत का फाँस लेकर बैठ गई। आधे फेरे होने के बाद एक साँप आया और वह दूल्हे को डसने ही वाला था कि बुआजी ने उसकी तरफ दूध का कटोरा सरका दिया। जब साँप दूध पी रहा था, तो बुआजी ने तांत से उस साँप को फँसा लिया। थोड़ी देर में साँपनी आई और साँप को छोड़ने के लिए कहने लगी। बुआजी ने कहा कि वह साँप को उसी शर्त पर छोड़ेगी, जब सांपनी पहले उसके छहों भतीजों और उनकी पत्नियों को वापस लौटा देगी। सौंपनी ने साहूकार के छहों बेटे वापस लौटा दिया और साँप को लेकर चली गई। साहूकार अपने सातों बेटों और बहुओं को पाकर अत्यंत प्रसन्न हुआ। धूमधाम से विवाह सम्पन्न हुआ। साहूकार के परिवार ने सर्वप्रथम दुबड़ी साते की पूजा की, क्योंकि उसी के आशीर्वाद से साहूकार को पुनः पुत्रों व पुत्रवधुओं का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।

हे दूबड़ी साते माँ! जैसा उस साहूकार के बेटे - बहुओं के लिए किया वैसा सबके लिए करना-कहानी कहने वाले के लिए, सुनने वालों के लिए, हुंकारा भरने वालों के लिए सारे परिवार के लिये।

बिन्दायकजी की कहानी...

बिन्दायकजी की कथा - 1

एक अन्धी बूढ़ी माई थी। उसके एक बेटा और बहू थे। वह हर रोज़ गणेशजी की पूजा करती थी। गणेशजी महाराज उससे रोज कहते थे, 'बुढ़िया माई कुछ माँग।' बुढ़िया माई कहती, 'मुझे तो मांगना नहीं आता।' गणेशजी बोले, 'अपने बेटे बहू से पूछ ले, फिर माँग ले।' बुढ़िया माई ने अपने बेटे से कहा, 'बेटा गणेशजी कहते हैं, कुछ माँग सो मैं क्या माँगू?' बेटा बोला, 'माँ धन माँग लो।' उसने बहू से पूछा। बहू बोली, 'सासूजी पोता माँग लो।' बुढ़िया ने सोचा ये तो दोनो अपने अपने मतलब की चीज माँगने का कह रहे हैं। वह अपनी पड़ोसन के पास गई और बोली, 'मुझे गणेशजी कुछ माँगने का बोल रहे हैं, सो मैं क्या मागूँ? बेटा कहता है धन मांग ले, बहू कहती है पोता माँग लो तो मैं क्या करूँ?' पडोसन बोली, 'क्यों तू पैसा मांगे और क्यों पोता माँगे, थोड़े दिन जीना हैं सो अपने लिए 'दीदा-गोड़ा' (स्वस्थ शरीर) माँग ले।'

बुढ़िया माई ने पड़ोसन की भी बात नहीं मानी। उसने सोचा बेटे बहू की भी बात माननी चाहिए और अपने सुख की भी। दूसरे दिन गणेशजी आए बोले, 'बुढ़िया माई कुछ माँग।' वो बोली, 'मैं अपने पोते को सोने के कटोरे में दूध पीता देखूँ' । इस तरह एक वरदान में उसने अपने बेटे के लिए धन, बहु के लिए बेटा व अपने लिए नेत्र दृष्टि व अच्छा स्वास्थ्य मांग लिया। गणेशजी बोले, 'अरे बुढ़िया माई तुम तो चतुर हो। तुमने तो सब कुछ माँग लिया। सब इसी तरह हो जाएगा।' इतना कह कर गणेशजी अन्तर्ध्यान हो गए।

हे गणेशजी महाराज जैसा उस बुढ़िया माई को दिया वैसा सबको देना-कहानी कहने वाले को सुनने वालों को, हूँकारा भरने वालों को, अपने सारे परिवार को।

बिन्दायकजी की कथा 2

एक छोटा-सा लडका था वह अपने घर से लड़कर भाग गया और बोला कि वह बिन्दायक जी से मिलकर ही घर लौटेगा। लड़का घने जंगल में पहुँच गया। गणेश जी ने सोचा कि यह मेरे नाम से घर से निकला है कहीं उसे कोई जानवर न खा जाए, उसे सकुशल हुँचा देना चाहिये। गणेश जी बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण करके उस लड़के के पास गये और उससे पूछा, 'तुम कहाँ जा रहे हो ?" उसने कहा, 'मैं गणेश जी से मिलने जा रहा हूँ' । बुढे ब्रह्मण ने कहा, 'मैं ही गणेश जी हूँ जो माँगना है माँगो पर एक ही वर माँगना'। उस लड़के ने कहा, 'ढोल हिंगराज की, पूँछ गजराज की, दाल भात, परांठा, ऊपर से बहुत सारी चीनी और उसे परोसने वाली नारी दो, जो गुलाब के फूल की तरह सुन्दर हो' । गणेश जी बोले, 'तुमने तो सब कुछ माँग लिया, जैसा माँगा वैसा ही हो जाऐगा'। लड़का घर आकर देखता है कि एक छोटी सी सुन्दर नारी बैठी है और घर धन सम्पत्ति से भर गया है। उसने अपने माता-पिता से कहा, 'देखो मैं ये सब गणेशजी से माँग कर लाया हूँ। सब उससे बहुत खुश हुए। हे बिन्दायक जी जैसा उस लड़के को दिया, वैसा सभी को देना - कहानी कहने वाले को, सुनने वालों को, हुंकारा भरने वालों को, अपने सारे परिवार को ।

बिन्दायकजी की कथा 3

एक छोटा सा लड़का चावल के कुछ दाने व एक कटोरी दूध लेकर घूम रहा था और सबसे कह रहा था कि कोई मेरे लिए खीर बना दो पर कोई तैयार नहीं हुआ। एक बुढ़िया माई बोली कि आ जा बेटा मैं बना देती हूँ। वह एक छोटी-सी कटोरी लाई बिंदायकजी बोले, 'माई एक बड़ी कढ़ाही लाओ'। बुढ़िया माई बड़ी कढाई लाई। दूध की छोटी कटोरी से कढ़ाई भर गयी। बिन्दायक जी बोले, "मैं बाहर जाकर आता हूँ। आप खीर बनाकर तैयार रखना' । खीर तैयार हो गई पर बिन्दायकजी नहीं आए। खीर की सुगन्ध से बुढ़िया माई का मन मचल गया। उसने गणेश जी का स्मरण करके दरवाजे के पीछे छुपकर, 'जय बिन्दायक जी' बोलकर कटोरा भर खीर खा ली। इतने में बिन्दायक जी आ गए। बुढ़िया माई बोली खीर तैयार है बिन्दायकजी बोले, 'मैंने तो खीर तभी खा ली थी, जब तुमने मुझे याद किया था। मैं बहुत प्रसन्न हूँ, मांग लो जो माँगना है'। बुढ़िया माई ने कहा, 'मुझे तो कुछ नहीं चाहिये, सिर्फ अन्न, धन, प्रभु भक्ति और मोक्ष मिल जाए'। बिन्दायक जी उसे इतना धन-दौलत दिया, जो उसकी सात पीढ़ियों के लिये पर्याप्त था।
हे बिन्दायकजी महाराज जैसे उस बुढ़िया मां पर कृपा करी वैसे सब पर करना- कहानी कहने वाले पर, सुनने वालों पर, हुंकारा भरने वालों पर, सारे परिवार के साथ।

कथा सुनते समय हाथ में कुछ दानें मोठ बाजरा के रखते हैं। कथा की समाप्ति पर इन दानों को पाटे के उपर छोड़ देते हैं।

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