गणेश चतुर्थी (लड़कों का सिंधारा)
कब: भाद्रपद/भादो मास- अगस्त/ सितम्बर
यह सिंधारा गणेश चौथ पर भादो शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है। इसको चोक चांनणी का सिंधारा भी कहते हैं।
यदि बिटिया की शादी दूसरे शहर में हुई है, तो जंवाई व बच्चों के लिए कपड़े, सासूजी की साड़ी भेजते हैं। साथ में कुछ फल, मिठाई भी भेजते हैं। (शादी के पहले साल व सगाई के साल)
इस दिन बेटों का सिंधारा किया जाता है। उनका लाड़-चाव करके उन्हें मनपसंद भोजन कराते हैं। यदि बेटी की शादी उसी शहर में ही हुई है तो जंवाई को घर पर भोजन के लिए बुलाते हैं। बेटी के पुत्र को भी उपहार देते हैं। फल, मिठाई भेजते हैं। जंवाई को तिलक करके रुपया देते हैं। (शादी के पहले साल व सगाई वाले साल) इस दिन गणेशजी की पूजा कर लड्डू से भोग लगाते हैं। आरती गाते हैं।
आरती श्री गणेशजी की
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा ।
लडुवन का भोग लगे सन्त करे सेवा।
एकदन्त दयावन्त चार भुजा धारी।
मस्तक सिन्दूर सोहे मूसे की सवारी ।।
अन्धन को आँख देत कोढ़िन को काया ।
बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया।।
लडुवन का भोग लागे सन्त करे सेवा।
हार चढ़ें फूल चढ़ें और चढ़ें मेवा ।।
दीनन की लाज राखो शम्भु-सुत वारी ।
कामना को पूरा करो जग बलिहारी ।।
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